सैफई : बदलते मौसम और बढ़ती सर्दी के बीच उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय सैफई के ईएनटी विभाग में बच्चों के कान में सरसों का तेल डालने से होने वाले संक्रमण के मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में दर्द या खुजली होने पर तेल डालने की वर्षों पुरानी परंपरा बच्चों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। डॉक्टरों के अनुसार पिछले दिनों में कान में फफूंदी, सूजन और मवाद बनने जैसे मामलों में तेजी आई है, जिनका सीधा संबंध घरेलू उपचार के गलत प्रयोग से पाया गया है।

बुधवार को ईएनटी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. संजीव यादव व उनकी टीम ने ओपीडी में करीब 240 मरीजों की जांच की, जिनमें कई बच्चों को गंभीर संक्रमण के कारण भर्ती करना पड़ा। डॉ. संजीव ने बताया कि तेल डालने से कान की सतह गीली हो जाती है और फंगल संक्रमण तेजी से फैलता है। कई बच्चों के कान में इतना मवाद जमा मिला कि सुनने में कठिनाई तक विकसित हो गई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बच्चों के कान में किसी भी परिस्थिति में तेल डालना न केवल खतरनाक है, बल्कि कई बार स्थायी नुकसान तक पहुंचा देता है।

मौसम के उतार-चढ़ाव के साथ ईएनटी विभाग में खांसी, जुकाम, गला खराब और एलर्जी के मरीजों की संख्या भी बढ़ी है। इटावा और आस-पास के क्षेत्रों में पराली जलाने से फैले धुएं ने एलर्जी से पीड़ित बच्चों की तकलीफ को और बढ़ा दिया है। डॉक्टरों ने बताया कि छोटे बच्चे ठंड, धूल और धुएं से जल्दी प्रभावित हो रहे हैं। कई मरीज गले में सूजन, सांस में जलन और कान दर्द जैसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंचे हैं। डॉ. संजीव ने यह भी चिंता जताई कि लोग बिना परामर्श एंटीबायोटिक दवाएं लेने लगे हैं, जिससे दवा का असर कम हो जाता है और स्थिति और बिगड़ती है। उन्होंने सलाह दी कि प्रदूषण वाले क्षेत्रों में मास्क पहनें, धूम्रपान से दूर रहें और किसी भी ईएनटी समस्या पर सीधे विशेषज्ञ से परामर्श लें। खासतौर से बच्चों में किसी भी घरेलू नुस्खे, विशेषकर कान में तेल डालने से पूरी तरह परहेज करें और परेशानी होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
